रिश्तों का अपना संगीत होता है,
अपनी राग-रागिनियों में मुग्ध रिश्ते
झूमते हैं, नाचते हैं.
रिश्तों का आरोह-अवरोह रोचक होता है,
रिश्तों की वीणा तभी तक कर्णप्रिय होती है
जब तक वाणी में शालीनता रहती है
अन्यथा जीवन में सुरदोष का आगमन होता है.
रिश्तों की बांसुरी मनमोहक लगती है
पर जब रिश्तों की ढोलक को
ज़्यादा पीटा जाता है
तो कान ख़राब हो जाते हैं.
जिस प्रकार मधुर संगीत में
यथोचित संतुलन की आवश्यकता होती है
उसी प्रकार रिश्तों की प्रगाढ़ता व बेहतरी के लिए
संतुलन ज़रूरी होता है
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भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। जीवन को देखने का सबका दृष्टिकोण अलग होता है। चिंतन व मंथन से विचार का जन्म होता है, वहीं अवलोकन से अनुभूति के दर्शन का ज्ञान होता है। जो कुछ अच्छा लगता है, उसको अपने नैसर्गिक प्रवाह में रखने का मेरा प्रयास है यह ब्लॉग। भाषा के बंधन से परे ..
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रिश्ते 33
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